संत–ब्राह्मण प्रसाद सेवा
सेवा का परिचय
संत–ब्राह्मण प्रसाद सेवा ठाकुर श्री राधा सनेह बिहारी जी की कृपा और करुणा को समाज में बाँटने की एक अद्भुत परंपरा है। इस सेवा के माध्यम से भक्त ठाकुर जी के भोग रूपी प्रसाद को संतों, ब्राह्मणों और साधुजनों को समर्पित करते हैं। यह सेवा भक्त और प्रभु के मध्य भक्ति का सेतु बनकर दान, विनम्रता और सेवा भाव का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करती है।
यह सेवा न केवल एक धार्मिक कार्य है, बल्कि समाज में प्रेम, सम्मान और एकता का प्रतीक भी है।
सेवा का महत्व
ब्राह्मण और संत समाज भगवान के वचन और ज्ञान के संवाहक हैं। उन्हें ठाकुर जी का प्रसाद समर्पित करना “साक्षात् भगवान को अर्पण करने” के समान माना गया है। यह सेवा भक्त के जीवन में पुण्य, शांति और संतोष का संचार करती है।
जब ठाकुर जी का प्रसाद संतों तक पहुँचता है, तब वह केवल अन्न नहीं, कृपा का माध्यम बन जाता है।
अर्पण के प्रकार
- भोजन प्रसाद वितरण: मंदिर प्रांगण में संतों और ब्राह्मणों के लिए सामूहिक भोजन व्यवस्था।
- सुखा प्रसाद वितरण: मिष्ठान्न, सूखे मेवे, फल और पंचामृत अर्पण।
- विशेष अवसर पर दान: वस्त्र, अन्न, या दक्षिणा के रूप में अर्पण।
- पर्व विशेष सेवा: जन्माष्टमी, पूर्णिमा, या कथा आयोजन के दौरान विशेष संत सेवा।
सेवा प्रक्रिया
- भक्त वेबसाइट या मंदिर कार्यालय में सेवा आरक्षित करें।
- मंदिर प्रबंधन सेवा की तिथि, संत संख्या और प्रसाद प्रकार तय करेगा।
- तय दिन पर मंदिर में सामूहिक प्रसाद वितरण सम्पन्न होगा।
- अर्पण के पश्चात आरती और धन्यवाद संकीर्तन किया जाएगा।
- सेवा पूर्ण होने पर भक्त को पुष्टिकरण और रिपोर्ट भेजी जाएगी।
नियम एवं दिशा–निर्देश
- सेवा में उपयोग होने वाली सामग्री सात्त्विक और शुद्ध होनी चाहिए।
- यदि भक्त वस्त्र या अन्न अर्पण करना चाहते हैं, तो मंदिर प्रबंधन से पूर्व अनुमति आवश्यक है।
- सेवा आयोजन में अनुशासन और स्वच्छता का पालन आवश्यक है।
- विशेष पर्वों या कथा आयोजनों के दौरान सेवा का समय मंदिर द्वारा तय किया जाएगा।
सेवा बुकिंग हेतु आवश्यक विवरण
- भक्त का नाम
- गोत्र
- नक्षत्र / जन्म राशि (यदि उपलब्ध हो)
- सेवा किसके नाम से करवाई जा रही है
- अवसर (पर्व, पुण्यतिथि, कथा आदि)
- निवास स्थान
- ईमेल व मोबाइल नंबर
- तिथि और सेवा प्रकार
आध्यात्मिक संदेश
जो भक्त ठाकुर जी का प्रसाद संतों में बाँटता है, वह अपने कर्मों में भक्ति का अमृत घोल देता है। क्योंकि जहाँ संत तृप्त होते हैं, वहीं ठाकुर जी प्रसन्न होते हैं।